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950 करोड़ की धोखाधड़ी और 7 मौतें क्या हैं चारा घोटाले से जुड़े राज़?

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यह मामला उस दौर का है जब बिहार में जनता दल की सरकार थी और वहाँ का वित्तमंत्री थे लालू प्रसाद यादव। दरअशल यह मामला 27 जनवरी 1996 को उजागर हुआ जब बिहार चायवाशा ट्रेज़री के कलेक्टर अजय खेरे ने एक ही अमाउंट के सारे बिल देखे जो लगभग 09 लाख 90 हज़्ज़ार के थे। ये बिल दस लाख से इसलिए कम थे की 10 लाख से ज्यादा के बिलिंग के लिए ज्यादा परमिशन की जरुरत पड़ती है। जब इन्होने इस बारे में जांच पड़ताल की पता चला की जितना पैसा इस ट्रेज़री से निकला गया है उतना पुरे राज्य के इस विभाग का बजट भी नहीं है।
इस बारे में खबर फैलते ही देश के सभी राजनितिक दल बीजेपी , कॉग्रेस और समता दल ने सीबीआई के जांच के मांग उठायी , जिसके कारण पटना हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गयी जिसे पटना कोर्ट में मंजूरी के बाद बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। 11 मार्च 1996 को पटना हाई कोर्ट ने सीबीआई को जांच के आदेश जारी कर दिया। 27 मार्च 1996 को सीबीआई ने इस केश को अपने अंदर ले कर इस मामले से जुड़े छानबीन जारी की , जिसके बाद इस मामले से जुड़े गवाहें और दोषियों की हत्यायें शुरू हो गयी। जिसमे पशुपालन विभाग रांची के अस्सिटेंट डायरेक्टर लाला विश्व मोहन को जमशेदपुर में 19 नवम्बर 1996 को एक ट्रक ने कुचल दिया। वही 20 नवंबर 1996 को इस मामले के एक और आरोपी डॉ. विश्राव राव के ड्राइवर मनु मुंडा को अपहरण कर जान से मार दिया गया। सीबीआई का कहना था की ये दोनों इस मामले के अहम गवाह थे। इससे पहले भी सरकारी गाड़ियों में दोषिये के ऊपर कोर्ट ले जाते वक्त गुंडे ने गोलियॉं वरषाई थी लेकिन सारे दोषी सुरक्षित बच गए।
इसके बाद हत्याएँ तेज़ हो गयी। 26 दिसम्बर 1996 को जे एन तिवारी जो की पशुपालन विभाग के कर्मचारी थे , 15 मई 1997 को डॉ. राम राज 04 जुलाई 1998 को उमा शंकर प्रशाद (कर्मचारी ) की ट्रक हादसे में मौत हो गयी। वही 7 मई 1997 को हरीश खंडे वालन (सप्लायर) की घनवाद रेलवे लाइन पर सर कटी लाश मिली और 12 जून 1997 को विवेकानद शर्मा जो की इस पुरे घोटाले के खिलाफ पेटिशन दर्ज की थी , गोली मरकर हत्या कर दी गयी।
10 जनवरी 1997 को सीबीआई को इस मामले में लालू प्रसाद के बारे में पता चलते ही बिहार के राज्पाल से अनुमति लेकर बिहार के पांच बड़े अधिकारी (जिसमे अरुमुघन , बेग जूलियस , मूलचंद और राम राज शामिल थे ) हिरासत में ले कर पूछताछ के बाद 26 जून 1997 को अपना आरोप पत्र दायर किया जिसमे लालू समेत 55 लोगो को आरोपी घोषित किया गया। जिसमे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्र देव वर्मा शामिल थे।
सीबीआई के अनुसार यह घोटाला 1990 से 1996 के बीच हुआ था , जब लालू यादव बिहार के वित्तमंत्री थे और इसके अनुमति के बिना इतना पैसा निकलना संभव नहीं था। 05 जुलाई 1997 को लालू प्रसाद यादव ने राष्टीय जनता दल पार्टी का निर्माण किया और 25 जुलाई 1997 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर 28 जुलाई 1997 को कांग्रेस से मिलकर राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित कर दिए। 30 जुलाई 1997 को लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार कर लिया गया और 135 दिन बाद उसे जमानत मिल गया।
अक्टूबर 2001 को बिहार से टूटकर एक नया राज्य बना झारखण्ड , जिसके बाद सारे मामलो को रांची शिफ्ट कर दिया गया। इस मामला की सुनवाई 2006 ने ख़त्म हो गया और 31 मई 2007 को रांची के सीबीआई अदालत ने लालू प्रसाद के गिरफ्तारी के बाद 31 अक्टूबर 2013 को लालू को पांच साल और जगन्नाथ मिश्र को 4 साल की सजा सुनाई। कुल 53 मामलो में से 47 मामले की सुनाई पहले ही आ चुकी थी और 48वा मामले देवघर के खजाने से अवैध निकाशी मामले में कोर्ट में लालू प्रसाद यादव को दोषी करार दिया है।

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