Latest News , opinion & viral stories from India in hindi

मिल गया पाताल जाने का रास्ता, धरती के नीचे है एक और दुनिया, जहां सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंचती

0 15

क्या धरती से पाताल लोक को कोई रास्ता जाता है. एक गुफा है, जिसमें रहस्यों की दुनिया बसती है. इस गुफा का एक सिरा तो दिखता है, लेकिन वो कहां खत्म होता है, इसका किसी को पता नहीं. हमारे देश में कुछ ऐसे रहस्य है जिन्हें जान पाना कठिन ही नहीं असंभव है. पाताल लोक की कहानियों का जिक्र तो हमारे शास्त्रों में बहुत है, लेकिन आज आपको बता दें कि पाताल लोक जाने का रास्ता भी हमारे ही देश में है !

Source

दंतकथाओं में हम पाताल लोक का जिक्र अक्सर सुनते हैं. हिंदू पौराणिक कथाओं में धरती से पाताल जाने के रास्ते का दावा किया जाता रहा है…एक दावे के मुताबिक, पाताल का रास्ता सतपुड़ा की पहाड़ियों में बताया जाता है, पातालकोट नाम के इस जगह पर आदमी तो दूर, सूरज की एक रोशनी का भी पहुंचना नामुमकिन है.

पाताल के दरवाज़े का हूबहू जिक्र रामायण और महाभारत में भी किया गया है, जब अहिरावण ने बलि देने के लिए सोते समय धोखे से राम-लक्ष्मण का अपहरण किया था, तब इसी रास्ते से होकर हनुमान, राम को ढूंढते हुए पाताल पहुंचे थे..इसी द्वार से रावण का पुत्र मेघनाद शिव पूजा करने के बाद पाताल की ओर रवाना हुआ था.

महाराष्ट्र के नागपुर से 120 किलोमीटर दूर छिंदवाडा में स्थित पातालकोट नाम का स्थान पाताल के होने की कहानी कहता है. यहां मौजूद पहाड़ों से नीचे की ओर बनी हजारों सीढ़ियों का कोई अंत नज़र नहीं आता है.

Source
 प्रकृति की गोद में बसा यह पाताललोक सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच 3000 फुट ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से तीन ओर से घिरा हुआ है. इस स्थान पर दो-तीन गांव तो ऐसे हैं जहां आज भी जाना नामुमकिन है. ऐसा माना जाता है कि इन गांवों में कभी सवेरा नहीं होता. जमीन से काफी नीचे होने और विशाल पहाड़ियों से घिरे होने के कारण इसके कई हिस्सों में सूरज की रौशनी भी देर से और कम पहुंचती है,मानसून में बादल पूरी घाटी को ढक लेते हैं और बादल यहां तैरते हुए नजर आते हैं. इन सब को देख सुन कर लगता है कि मानो धरती के भीतर बसी यह एक अलग ही दुनिया हो.

सतपुड़ा की पहाड़ियों में करीब 1700 फुट नीचे बसे ये गावं भले ही तिलिस्म का एहसास कराते हों लेकिन यहां बसने वाले लोग हम और आपकी तरह हांड़-मांस के इंसान ही हैं, यह लोग भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय के हैं जो अभी भी हमारे पुरखों की तरह अपने आप को पूरी तरह से प्रकृति से जोड़े हुए हैं सूर्य की रोशनी यदि पहुचती भी है तो कुछ देर के लिए ही.

Source

यही नहीं, यहां के स्थानीय लोग आज भी शहर की चकाचौंध से दूर हैं. उन्हें तो पूरी तरह से यह भी नहीं मालूम की शहर जैसी कोई भी चीज भी है. और चारों तरफ ऊंचे- ऊंचे पहाड़ लेकिन नीचे में लोग रहते भी हैं और गांव भी हैं. खूब घना जंगल है और आना-जाना पैदल ही होता है.

- Advertisement -

Leave A Reply

Your email address will not be published.