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ये फिल्मे जिसे मिलनी चाहिए ऑस्कर अवार्ड लेकिन नॉमिनेट भी नहीं किया गया

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भारत में बनी फिल्मों को ऑस्कर मिलना तो दूर नॉमिनेशन में आने का मौका भी नहीं मिलता। वे इसका इस्तेमाल बॉलीवुड की ग्लोबल पॉवर को अंडरएस्टीमेट करने के लिए करते हैं। उन्हें हिंदुस्तान पर न तो नाज़ है और न ही इसकी फिल्म इंडस्ट्री को वे समझ पाये। आपको बता दे अमेरिका के हर साल सौ के मुकाबले भारत में चार सौ फिल्में बनती हैं। अमेरिका में ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक ही सरनेम के तीन बूढ़े हो चुके नौजवान एक के बाद हिट देते जाते हैं और हर हिट 200 करोड़ का आंकड़ा पार करती है। ऑस्कर उनके लिए है, कामयाबी जिनके कदम ठीक से नहीं चूम पाती। भारत में भी हाल तक उन्हीं फिल्मों को अवॉर्ड मिलते थे, जिन्हें कोई देख नहीं रहा होता था।

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ऑस्कर के लिए पागल हो रही इस दुनिया को समझना चाहिए कि जो दिव्य टैलेंट बॉलीवुड के पास है उसे सम्मानित कर पाने का जज्बा इन अमेरीकियों के पास कहां। ये जलवा सिर्फ हिंदी फिल्मों में ही है कि वहां जो जेम्स बांड बनता है, यहां पान मसाला बेचते हुए पकड़ा जाता है। Pierce Brosnan जेम्स बॉन्ड का किरदार निभा चुके पियर्स ब्रोसनान बीते साल पान मसाला बेचते नज़र आए थे।

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छह सौ करोड़ लोग जब अपने मुल्क़ की फिल्मों को देखते हैं और उनमें से कुछ को सर माथे बिठाते हैं, उनके आगे ऑस्कर वैसा ही है जैसे आलू प्याज के साथ फ्री मिलने वाला धनिया और मिर्च। बॉलीवुड में ऐसा करना बस तो बहुतों के था लेकिन ‘धूम’, ‘कृष’, ‘सुल्तान’, ‘पीके’ और ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों ने 500 – 600 करोड़ की कमाई पर ध्यान दिया। फिर भी ऑस्कर पुरस्कार में न्यूटन जैसी फिल्मो को जगह नहीं दी गयी थी। यहाँ तक की न्यूटन को तो सिनेमाघरों में भी जगह नहीं मिली थी।

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हमें ऑस्कर की ज़रूरत नहीं है। हिंदी सिनेमा के पास एक से एक बेहतरीन नगीना हैं जिन्हें ऑस्कर ज्यूरी कभी स्वीकार नहीं करेगी। ‘सूर्यवंशम’, ‘एमएसजी’ और ‘देशद्रोही’ या ‘गुंडा’ जैसी फिल्मों का लेवल ऑस्कर में दौड़ रही फिल्मों से कहीं आगे है।

1995 में तूफान नाम की फिल्म में निर्देशक के बापईय्या ने ऐसा कर दिखाया और सुरेश ओबरॉय ने मिथुन चक्रवर्ती के मर जाने के बाद मधु के दिमाग में मिथुन का दिमाग प्रत्यारोपित कर दर्शकों का दिमाग खराब कर दिया था। क्या ये ऑस्कर लायक बात नहीं। ऑस्कर ज्यूरी को भारतीय सिनेमा से डर लगता है और इसलिए वो हमारे सिनेमा को दुनिया के सामने नहीं आने देना चाहते। वो अपनी ‘कॉन्ज्युरिंग’ और ‘इनसिडियस’ जैसी हॉरर फिल्मों को दिखाना चाहते है लेकिन हमारी ‘पुराना मंदिर’, ‘पुराना किला’ और जो भी कुछ पुराना हमारे पास है उसे नहीं दिखाना चाहते।

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ऑस्कर के लिए लगभग पागल हुए जा रहे विश्व सिनेमा को बॉलीवुड से सीख लेनी चाहिए और शायद सिनेमा के स्तर पर भारत को ‘विश्व गुरु’ मान लेने का सही समय यही है। 500, 600 यहां तक कि 1500 करोड़ कमा लेने वाले हमारे दबंग और बाहुबली सितारों ने आजतक कभी ऑस्कर की चाह रखी।

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